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शल्य पर्व
अध्याय ३१
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धृतराष्ट्र उवाच
न हि सन्तर्जना तेन श्रुतपूर्वा कदाचन |  २   क
राजभावेन मान्यश्च सर्वलोकस्य सोऽभवत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति