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शल्य पर्व
अध्याय ३१
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धृतराष्ट्र उवाच
इय़ं च पृथिवी सर्वा सम्लेच्छाटविका भृशम् |  ३   क
प्रसादाद्ध्रिय़ते यस्य प्रत्यक्षं तव सञ्जय़ ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति