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शल्य पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
सङ्क्षोभ्य सलिलं वेगाद्गदामादाय़ वीर्यवान् |  ३५   क
अद्रिसारमय़ीं गुर्वीं काञ्चनाङ्गदभूषणाम् |  ३५   ख
अन्तर्जलात्समुत्तस्थौ नागेन्द्र इव निःश्वसन् ||  ३५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति