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शल्य पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
गदाहस्तं तु तं दृष्ट्वा सशृङ्गमिव पर्वतम् |  ३८   क
प्रजानामिव सङ्क्रुद्धं शूलपाणिमवस्थितम् |  ३८   ख
सगदो भारतो भाति प्रतपन्भास्करो यथा ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति