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शल्य पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा सन्दष्टदशनच्छदः |  ४३   क
प्रत्युवाच ततस्तान्वै पाण्डवान्सहकेशवान् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति