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शल्य पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
अवहासस्य वोऽस्याद्य प्रतिवक्तास्मि पाण्डवाः |  ४४   क
गमिष्यथ हताः सद्यः सपाञ्चाला यमक्षय़म् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति