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शल्य पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
तस्य शोणितदिग्धस्य सलिलेन समुक्षितम् |  ४६   क
शरीरं स्म तदा भाति स्रवन्निव महीधरः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति