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शल्य पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
स मेघनिनदो हर्षान्नदन्निव च गोवृषः |  ४८   क
आजुहाव ततः पार्थान्गदय़ा युधि वीर्यवान् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति