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शल्य पर्व
अध्याय ३१
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धृतराष्ट्र उवाच
श्रुत्वा स कटुका वाचो जय़युक्ताः पुनः पुनः |  ५   क
किमव्रवीत्पाण्डवेय़ांस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति