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वन पर्व
अध्याय ५७
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वृहदश्व उवाच
मम ज्ञातिषु निक्षिप्य दारकौ स्यन्दनं तथा |  १८   क
अश्वांश्चैतान्यथाकामं वस वान्यत्र गच्छ वा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति