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शल्य पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
गदाय़ुद्धे न मे कश्चित्सदृशोऽस्तीति चिन्तय़ |  ६०   क
गदय़ा वो हनिष्यामि सर्वानेव समागतान् |  ६०   ख
गृह्णातु स गदां यो वै युध्यतेऽद्य मय़ा सह ||  ६०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति