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शल्य पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा स कटुका वाचो विषमस्थो जनाधिपः |  ७   क
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य सलिलस्थः पुनः पुनः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति