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कर्ण पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
न च केन च धर्मेण विरुध्यन्ते प्रजा इमाः |  ५१   क
सर्वे हि तेऽव्रुवन्धर्मं यथोक्तं वेदपारगैः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति