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शान्ति पर्व
अध्याय ३११
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भीष्म उवाच
स तु धैर्येण महता निगृह्णन्हृच्छय़ं मुनिः |  ६   क
न शशाक निय़न्तुं तद्व्यासः प्रविसृतं मनः |  ६   ख
भावित्वाच्चैव भावस्य घृताच्या वपुषा हृतः ||  ६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति