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शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
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जनक उवाच
समावृत्तस्तु गार्हस्थ्ये सदारो निय़तो वसेत् |  १७   क
अनसूय़ुर्यथान्याय़माहिताग्निस्तथैव च ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति