शान्ति पर्व  अध्याय ३१३

जनक उवाच

स वनेऽग्नीन्यथान्याय़मात्मन्यारोप्य धर्मवित् |  १९   क
निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा व्रह्माश्रमपदे वसेत् ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति