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शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
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जनक उवाच
राजसांस्तामसांश्चैव नित्यं दोषान्विवर्जय़ेत् |  २८   क
सात्त्विकं मार्गमास्थाय़ पश्येदात्मानमात्मना ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति