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शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
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जनक उवाच
ज्योतिरात्मनि नान्यत्र रतं तत्रैव चैव तत् |  ३२   क
स्वय़ं च शक्यं तद्द्रष्टुं सुसमाहितचेतसा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति