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शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
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भीष्म उवाच
एभिः शिष्यैः परिवृतो व्यास आस्ते महातपाः |  २५   क
तत्राश्रमपदं पुण्यं ददर्श पितुरुत्तमम् |  २५   ख
आरणेय़ो विशुद्धात्मा नभसीव दिवाकरः ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति