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शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
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भीष्म उवाच
व्राह्मणाय़ सदा देय़ं व्रह्म शुश्रूषवे भवेत् |  ४०   क
व्रह्मलोके निवासं यो ध्रुवं समभिकाङ्क्षति ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति