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स्त्री पर्व
अध्याय १६
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वैशम्पाय़न उवाच
जय़द्रथस्य कर्णस्य तथैव द्रोणभीष्मय़ोः |  २८   क
अभिमन्योर्विनाशं च कश्चिन्तय़ितुमर्हति ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति