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शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
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भीष्म उवाच
एतन्मनोनुकूलं मे भवानर्हति भाषितुम् |  १७   क
सर्वज्ञः सर्वदर्शी च सर्वत्र च कुतूहली ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति