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शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
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भीष्म उवाच
अन्योन्यं च सभाज्यैवं सुप्रीतमनसः पुनः |  ३   क
विज्ञापय़न्ति स्म गुरुं पुनर्वाक्यविशारदाः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति