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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
दिव्यैश्च पुष्पैस्तं देवाः समन्तात्पर्यवाकिरन् |  १४   क
देवदुन्दुभय़श्चैव नेदुः स्वय़मुदीरिताः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति