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शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
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भीष्म उवाच
एतत्तु महदाश्चर्यं यदय़ं पर्वतोत्तमः |  ५४   क
कम्पितः सहसा तेन वाय़ुनाभिप्रवाय़ता ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति