शान्ति पर्व  अध्याय ३१६

नारद उवाच

परिग्रहं परित्यज्य भव तात जितेन्द्रिय़ः |  २०   क
अशोकं स्थानमातिष्ठ इह चामुत्र चाभय़म् ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति