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शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
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नारद उवाच
इन्द्रिय़ैर्निय़तैर्देही धाराभिरिव तर्प्यते |  ५०   क
लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति