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शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
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नारद उवाच
भैषज्यमेतद्दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तय़ेत् |  १२   क
चिन्त्यमानं हि न व्येति भूय़श्चापि प्रवर्धते ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति