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शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
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नारद उवाच
परित्यजति यो दुःखं सुखं वाप्युभय़ं नरः |  १७   क
अभ्येति व्रह्म सोऽत्यन्तं न तं शोचन्ति पण्डिताः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति