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शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
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नारद उवाच
प्रणय़ं प्रतिसंहृत्य संस्तुतेष्वितरेषु च |  २९   क
विचरेदसमुन्नद्धः स सुखी स च पण्डितः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति