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शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
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नारद उवाच
सङ्गत्या जठरे न्यस्तं रेतोविन्दुमचेतनम् |  २३   क
केन यत्नेन जीवन्तं गर्भं त्वमिह पश्यसि ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति