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शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
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नारद उवाच
इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम् |  ३५   क
स्रोतसा सहसा क्षिप्तं ह्रिय़माणं वलीय़सा ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति