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शान्ति पर्व
अध्याय १३३
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कापव्य उवाच
ये हि राष्ट्रोपरोधेन वृत्तिं कुर्वन्ति केचन |  २१   क
तदेव तेऽनु मीय़न्ते कुणपं कृमय़ो यथा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति