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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
और्जस्थ्यं विजय़ेदेवं सङ्गृह्णन्साधुसंमतान् |  २१   क
कालेन साधय़ेन्नित्यं नाप्राप्तेऽभिनिपीडय़ेत् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति