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शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
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भीष्म उवाच
न ह्येष क्षय़माप्नोति सोमः सुरगणैर्यथा |  ५४   क
कम्पितः पतते भूमिं पुनश्चैवाधिरोहति |  ५४   ख
क्षीय़ते हि सदा सोमः पुनश्चैवाभिपूर्यते ||  ५४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति