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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
तद्रूपधारिणं रुद्रं रौद्रकर्म चिकीर्षवः |  ५१   क
निशम्य दानवाः सर्वे हृष्टाः समभिदुद्रुवुः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति