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अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
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च्यवन उवाच
सहस्रं नाहमर्हामि किं वा त्वं मन्यसे नृप |  ७   क
सदृशं दीय़तां मूल्यं स्ववुद्ध्या निश्चय़ं कुरु ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति