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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
नैवेशिकं सर्वगुणोपपन्नं; ददाति वै यस्तु नरो द्विजाय़ |  ३३   क
स्वाध्याय़चारित्रगुणान्विताय़; तस्यापि लोकाः कुरुषूत्तरेषु ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति