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शान्ति पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
ते त्वय़ा धर्महन्तारो निहताः सपदानुगाः |  ८   क
स्वधर्मे वर्तमानस्त्वं किं नु शोचसि पाण्डव |  ८   ख
राजा हि हन्याद्दद्याच्च प्रजा रक्षेच्च धर्मतः ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति