वन पर्व  अध्याय २१८

मार्कण्डेय़ उवाच

अरजे वाससी रक्ते वसानः पावकात्मजः |  ३१   क
भाति दीप्तवपुः श्रीमान्रक्ताभ्राभ्यामिवांशुमान् ||  ३१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति