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उद्योग पर्व
अध्याय १७
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अगस्त्य उवाच
यच्चापि त्वमृषीन्मूढ व्रह्मकल्पान्दुरासदान् |  १४   क
वाहान्कृत्वा वाहय़सि तेन स्वर्गाद्धतप्रभः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति