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वन पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय़ देवेन्द्रः परवीरहा |  २१   क
अङ्कमारोपय़ामास प्रश्रय़ावनतं तदा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति