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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
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जनक उवाच
नाहमात्मार्थमिच्छामि रूपं ज्योतिश्च चक्षुषा |  १९   क
तस्मान्मे निर्जितं ज्योतिर्वशे तिष्ठति नित्यदा ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति