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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
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जनक उवाच
ततः प्रहस्य जनकं व्राह्मणः पुनरव्रवीत् |  २४   क
त्वज्जिज्ञासार्थमद्येह विद्धि मां धर्ममागतम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति