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शल्य पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
मृगा वहुविधाकाराः सम्पतन्ति दिशो दश |  १२   क
दीप्ताः शिवाश्चाप्यनदन्घोररूपाः सुदारुणाः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति