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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं स्वसा राजचमूपतेस्तु; प्रवृद्धनीलोत्पलदामवर्णा |  ११   क
पस्पर्ध कृष्णेन नृपः सदा यो; वृकोदरस्यैष परिग्रहोऽग्र्यः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति