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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं तु निष्टप्तसुवर्णगौरी; राज्ञो विराटस्य सुता सपुत्रा |  १४   क
भार्याभिमन्योर्निहतो रणे यो; द्रोणादिभिस्तैर्विरथो रथस्थैः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति