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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
तेऽव्रुवञ्ज्ञातुमिच्छामः कतमोऽत्र युधिष्ठिरः |  ३   क
भीमार्जुनय़माश्चैव द्रौपदी च यशस्विनी ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति