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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
तानाचख्यौ तदा सूतः सर्वान्नामाभिनामतः |  ४   क
सञ्जय़ो द्रौपदीं चैव सर्वाश्चान्याः कुरुस्त्रिय़ः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति