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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं पुनः पद्मदलाय़ताक्षी; मध्यं वय़ः किञ्चिदिव स्पृशन्ती |  ९   क
नीलोत्पलाभा पुरदेवतेव; कृष्णा स्थिता मूर्तिमतीव लक्ष्मीः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति